महर्षि औघड़दास बाबा जी
परम तपस्वी

महर्षि औघड़दास बाबा जी

धौरमती नदी के पूर्व में स्थित पड़ा सुआरन टोला के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे पंडित सरयू प्रसाद जी का जीवन सन 1962 में अमरकंटक की यात्रा के दौरान पूरी तरह बदल गया, जब उन्हें 3100 वर्ष पुरानी आध्यात्मिक शक्ति का साक्षात्कार हुआ।

आध्यात्मिक साधना एवं लोक कल्याण

सन 1962 में पंडित सरयू प्रसाद जी को अमरकंटक की पवित्र यात्रा के दौरान एक दिव्य ऋषि के रूप में महान आध्यात्मिक शक्ति का साक्षात्कार हुआ। उसी क्षण से उन्होंने अपना समूचा जीवन जगत कल्याण हेतु समर्पित कर दिया। उसी अलौकिक शक्ति के प्रभाव से वे शिव उपासक औघड़दास बाबा के रूप में प्रतिष्ठित हुए। सन 1962 से 1990 तक उन्होंने 28 वर्षों तक मौन, कठिन साधना और शिव भक्ति में स्वयं को लीन रखा।

 

नवंबर 1990 में पूज्य बाबा जी ने लोक कल्याण के उद्देश्य से श्री औघड़दास आश्रम यज्ञलोक की स्थापना की। आश्रम की स्थापना के पावन अवसर पर 9 से 13 नवंबर 1990 तक प्रथम रुद्र महायज्ञ का भव्य आयोजन किया गया। इस महायज्ञ के पश्चात बाबा जी ने औपचारिक सन्यास ले लिया और आजीवन अन्न का पूर्ण त्याग कर केवल आलू का सेवन करने का अत्यंत कठिन संकल्प लिया, जिसका उन्होंने 34 वर्षों तक अनवरत पालन किया।

 

बाबा जी का यह वाक्य 'जीव की सेवा, जाति की नहीं' आध्यात्मिक दर्शन और सामाजिक समरसता का उद्घोष है। उनकी प्रेरणा से पिछले 18 वर्षों से लगातार हर माह की 9 तारीख को 'दरिद्र नारायण सेवा संस्थान' के माध्यम से दीन-हीनों को भोजन, वस्त्र और चिकित्सा सेवाएं निशुल्क प्रदान की जा रही हैं, जो आज भी अनवरत जारी हैं।

 

यह तपस्वी जीवन 14 जून 2023 (एकादशी के पावन दिन) को अपने पूर्ण विराम पर पहुँचा जब बाबा जी ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया और महाप्रयाण को प्राप्त हुए।

 

आज भी प्रत्येक भक्त के हृदय में गूंजता है। आश्रम में श्री गजेन्द्र दुबे जी के संचालन में सेवा और साधना की ज्योति निरंतर प्रज्वलित है।

"आज भी प्रत्येक भक्त के हृदय में गूंजता है। आश्रम में श्री गजेन्द्र दुबे जी के संचालन में सेवा और साधना की ज्योति निरंतर प्रज्वलित है।"
— परम तपस्वी बाबा औघड़दास जी

बाबा जी के तीन मूल सिद्धांत

volunteer_activism

निःस्वार्थ सेवा

बिना किसी भेदभाव के समाज के अंतिम व्यक्ति तक भोजन, वस्त्र और सहायता पहुँचाना ही बाबा जी की सेवा का मूल आधार है।

self_improvement

कठोर साधना

शिव उपासक के रूप में मौन, सन्यास, और अन्न त्यागकर केवल आलू का सेवन करना उनके अटूट संकल्प का परिचायक है।

menu_book

त्रयोदशवाँ ज्योतिर्लिंग

यह तपोस्थली पावन यज्ञ भूमि आने वाले दो सौ- तीन सौ वर्ष बाद तेरहवें ज्योतिर्लिंग श्री औधरेश्वर महादेव के रूप में पूजित होगी।

spa

ॐ नमः शंकराय ॐ ९९९"